Lokavatran
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Author : Dr. Mamta Khede
Language : Hindi
Pages No : 150
वैदिक सूक्तों के लोक में अवतरण के साक्षी होने के क्षण की प्रतिध्वनि है।
समय के प्रवाह ने वैदिकी को संस्कृत बनाया और फिर वाणी की यह धारा हिन्दी की और हिन्द की अनेक बोलियों और भाषाओं में अवतरित होती रही किन्तु जिज्ञासा के, अनुभूति के, संवेदना के, बुद्धि के और श्रुति के उस महाप्रसाद को, जो वेदों के रूप में भारतीय जनमानस को प्राप्त हुआ था, उसे वाणी के अविरल प्रवाह के साथ लोक-मानस की निरंतरता की थाती बनाने में हम चूक गए। परिणाम स्वरूप वेद का 'जानना' भाषा के परिनिष्ठित दायरों मे सीमित हो गया।
वैदिक सूक्तों की दिव्यता, मौलिक जिज्ञासा, आदिम संवेदना और चिन्तन की पराकाष्ठा का लोक-प्रसार अभिव्यक्ति प्रणाली और अभिव्यंजना के माध्यम की सहजता की मांग करता है, जिसे जन-जन में प्रचलित हिन्दी और बोली में अवतरण से सम्भव बनाया जा सकता है।
प्रस्तुत पुस्तक 'लोकावतरण' भगवती श्रुति का लोक में अवतार है। जिसे निमाड़ी और हिन्दी में लिपिबद्ध किया गया है।
ऋग्वेद और अथर्ववेद से दस प्रमुख सूक्तों को सर्वप्रथम वैदिकी संस्कृत में यथावत् फिर निमाड़ी में भावान्तर प्रस्तुत किया है, पश्चात् इसे हिन्दी में अनुदित किया गया है, जिससे यह बोलियों के आंचलिक आस्वाद का पान कराती है तथा हिन्दी पाठकों की सुविधा अनुसार वैदिक ऋचाओं को बोधगम्य बनाती है।
इस पुस्तक में अथर्वशीर्ष, नासदीय सूत्र, हिरण्यगर्भ सूक्त, नदी सूक्त, विश्वामित्र नदी संवाद, संज्ञान सूक्त, सौमनस्य सूक्त, पुरुष सूक्त, अक्ष सूक्त और भूमि सूक्त को संजोया गया है।
आम जनमानस में वेद बहुत कठिन और जटिल विचार है। प्रस्तुत भावानुवाद वेदों की मौलिक चिन्तन प्रणाली के सहज और भावगम्य पहलू को सबके लिए खोल देने का प्रयास भर है। हर कोईं एक-एक सूक्त, एक-एक मंत्र से अपने लिए, अपने युग के लिए अपना प्राप्य प्राप्त कर सकता है। जिसकी दृष्टि में जितना विस्तार है, श्रुति-भगवती का उतना प्रसाद उसे प्राप्त होता है।
उक्त संकलन में प्रत्येक सूक्त में हर मंत्र को सर्वप्रथम संस्कृत में यथावत् लिखा गया फिर निमाड़ी में भावान्तर प्रस्तुत है और फिर निमाड़ी भावान्तर का हिन्दी में अनुवाद किया गया है, इस तरह वेद के प्रसाद को भाषा की त्रिवेणी में प्रस्तुत करने का विनम्र प्रयास विद्वजनों के अवलोकनार्थ एवं जन-सामान्य के लिए रसास्वादन हेतु प्रस्तुत है।