Sahitya Me Paryavaran ka Vaigyanik Adhyayan
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Author : Meera Goutam
Language : Hindi
Pages No : 428
यह शीर्षक ग्रंथ 'साहित्य में पर्यावरण का वैज्ञानिक अध्ययन ' मेरी फैलोशिप की 'शोधयोजना ' का प्रामाणिक प्रतिफलन है । यद्यपि पर्यावरण विशुद्ध विज्ञान है तथापि, साहित्य ने इसमें दख़ल देकर इसे मानवीय मुद्दा बना दिया है।
इस शोध अध्ययन की प्रकृति तुलनात्मक, अन्तर्विद्यावर्ती ( इंटर डिसिप्लिनरी)शोध की है जिसमें, अध्ययन के अनेक विषय जुड़ गए हैं।
संस्कृत के दार्शनिक और पौराणिक ग्रन्थों के अतिरिक्त, हिंदी और अंग्रेजी के ग्रंथों का अध्ययन यह साबित करता है कि अंतत; सभी ग्रंथ ,मानव कल्याण के लिए ही रचे गए हैं।
मानविकी विषयों के अतिरिक्त एप्लाइड साइंस , भौतिक शास्त्र,रसायन शास्त्र, खगोलशास्त्र, भूगर्भ शास्त्र, समुद्र विज्ञान, धातुविज्ञान, पर्वत विज्ञान, जलविज्ञान, चिकित्सा शास्त्र, वनस्पति विज्ञान के अतिरिक्त नृ-शास्त्र, स्थापत्य, मनोविज्ञान, मानवशास्त्र, दर्शन, धर्म, समाज , संस्कृति, राजनीति , पुरातात्विक विज्ञान आदि अध्ययन के विषय यहां स्वत:ही जुड़ गए हैं जो सिद्ध करते हैं कि, अध्ययन के ये सभी अनुशासन आपस में जुड़े हुए हुए हैं क्योंकि ,इनका सम्बंध मनुष्य की बेहतरी से है और इनका सम्बंध प्रत्यक्ष पर्यावरण से है।
हमारी धरती पर " उपस्थित हर वस्तु हमारा पर्यावरण है ।"
अथर्ववेद संहिता,भाग - 2, मंत्र 3334/5, पृष्ठ, 6 पर लिखा गया है ,
" यत् ये भूमे विखनामि क्षिप्रं तदपि रोहतु,
मा ते मर्म विमृग्वरि मा ते हृदयमपिर्पम्।।"
अर्थ --" हे धरती मां ! जब हम कुछ बोने के लिए आपको खोदें तो, वे वस्तुएं शीघ्र उगें - बढ़ें। इस कार्य में हमारे द्वारा आपके मर्म स्थलों को अथवा हृदय को हानि न पहुंचे।"
पर्यावरण के इन समाधानों में ,मनुष्य और पूरे विश्व की करूण चिंताएं शामिल की गयी हैं।
मनुष्य के लिए शास्त्र और समाज दोनों उपयोगी होते हैं, बुरी होती है इनकी जड़ता।
मनुष्य विरोधी होते ही दोनों त्याज्य हो जाते हैं। ऋषि गण ऋचाओं के सृष्टा नहीं दृष्टा थे जिनके अनुसंधान वैश्विक हैं।
अध्ययन के लिए उन ग्रंथों को अवश्य पढ़ा जाना ज़रूरी है जिन्हें हमने, उपेक्षित मानकर छोड़ दिया है।
इस शोधकार्य में ,कवि शिवमंगल सुमन जी से प्रेरित हूं कि छूट रही चीजों का पारायण ज़रूरी है कि इनमें से बहुत सी काम की चीज़ें निकल सकती हैं ।
इतिहास सदैव चक्रवत नहीं होता वह एक रेखीय भी होता है
यह नयी चुनौती मैंने हृदयस्थ की और इस ग्रंथ में दर्ज़ किया है। अध्ययन की यात्रा का अंत कभी नहीं होता ।यह वर्तमान पर पांव जमाकर अपने अतीत, वर्तमान और भविष्य को खोजकर अपने निर्णय लेती है जो सदैव अभिनव संभावनाओं की तलाश में रहते हैं ,जिनका फ़ैसला अंतिम नहीं संभावनाओं में छिपा होता है।
शोध - प्रकिया से गुज़रते हुए मैंने पर्यावरण और उसके आसन्न ख़तरों को ही सामने रखा है।
मेरी पीठ ग्लोबल वार्मिंग से सीझ रही है । मेरा सर्वांग आकाश... के माथे पर छलछलाए पसीने से भीग रहा है..।
धरती से आकाश तक विध्वंस जारी है। मैं पिघलते हुए ग्लेशियरों को रोक लेना चाहती हूं .., शोर इतना तीव्र है कि पंछी दिग्भ्रमित हो रहे हैं। धरती का व्यवहार बदल रहा है और कोई सुध नहीं है ।पहाड़ मिट्टी के ढूह में तब्दील हो रहे हैं ...,
मिट्टी इस धरती की चमड़ी है, विज्ञान यह मानता है , " ज़मीन की नौ इंच मोटी ऊपरी सतह अथवा ह्मूमस पर सारी सभ्यता टिकी हुई है। वृक्ष इसकी रक्षा करते हैं।"
वैज्ञानिक अध्ययन के अनुसार, " वृक्षों के छत्र वर्षाजल के वेग को 8 से 25 प्रतिशत रोकते हैं । "
वृक्षों की जड़ों के नीचे सूखी पत्तियों की मोटी परत (ह्मूमस ) पानी के रोकती है। धरती के नीचे वृक्षों की जड़ों का जाल जल - संग्रहण करता है और ,विज्ञान की भाषा में इसे ही ' वाटर साइकल कहा जाता है।
इसीलिए इस ग्रंथ के मूल में ,पर्यावरण और उससे जुड़ी वैश्विक चिंताएं हैं जिनसे , विश्व जूझ रहा है।
पुस्तक का लेखन शोध - प्रविधि के अनुरूप है और ,प्रयुक्त सामग्री की सूची ग्रंथ के अंत में दी गयी है।
प्रामाणिक तथ्यों के लिए , वैज्ञानिकों से गंभीर चर्चा और परिसंवाद करके ही वैज्ञानिक तथ्य जुटाए गए हैं।
पौराणिक ग्रंथों में वेद और उपनिषदों से लेकर पौराणिक, ऐतिहासिक और अद्यतन ग्रंथों को शामिल किया गया है।
पर्यावरण और पारिस्थितिकी के अंतर्सम्बन्धों को स्पष्ट करते हुए यह पुस्तक इस ' मिथ ' को तोड़ रही है कि, प्रकृति ही पर्यावरण है।
पर्यावरण एक समग्रता है और, मूलतःपारिस्थितिकी(इकोलोजी )का अर्थ और कार्य, जीवमंडल में रहने वाले जीवों का, पर्यावरण से सम्बन्धों का विश्लेषण स्थापित करना है जो, सकारात्मक और नकारात्मक दोनों हो सकते हैं।
पर्यावरण एक व्यापक अवधारणा है जिसमें मनुष्य, समाज और उससे जुड़ा हर पक्ष शामिल हैं।
सृष्टि को संचालित करने वाले पांच घटक पृथ्वी,जल, अग्नि, आकाश और वायु के अतिरिक्त हर तरह के प्रदूषण और उनसे होने वाली क्षति के प्रति चेतावनियां हैं। इन प्रदूषणों से धरती पर आक्सीजन की कमी की चिंता और वर्षा वनों की क्षति इस शोध पुस्तक में विशेष रूप से उभरी है।
रेडिएशन और ओज़ोन परत में होने वाली क्षति की भयावहता के
और , धरती के क्षरण को पुस्तक में रेखांकित किया गया है। इसके कारण हम स्वयं हैं, जिसकी अनदेखी हम जानबूझकर करते हैंं। एक ओर युद्ध हैं और दूसरी तरफ पर्यावरण के भयानक संकट हैं।
जैव-विविधता और प्राकृतिक स्रोतों का विनाश , ग्लोबल वार्मिंग, भू-जल स्तर का गिरना जैसे भयावह प्रश्नों को साहित्य ने समझा है और , ये चिंताए साहित्य की गहरी चिंताओं में शामिल हैं।
यह किताब पर्यावरण संतुलन पर ज़ोर दे रही है और हर चुनौती का गंभीरता से अध्ययन कर रही है ।
यह ग्रंथ ,अपने विषय, महत्व और प्रासंगिकता के कारण पुरस्कृत हो चुका है ।
इसे विश्व के प्रतिष्ठित प्रकाशन संस्थान 'आईसेक्ट पब्लिकेशन , भोपाल (मध्यप्रदेश) ने छापा है और यह उन सुधिजनों को समर्पित है जो पर्यावरण की चिंता कर रहे हैं और जिनकी ,सृजन -यात्रा में पर्यावरण संकट के गंभीर प्रश्न शामिल हैं,मैं हृदय से आभारी हूं ..
इसकी मूल सामग्री को इसकी भूमिका 'अपनी बात ' प्राक्कथन और विषय की रूपरेखा और इसके अध्यायीकरण में पूरी तरह खोला गया है।
इसका चयन अखिल भारतीय स्तर पर ,
' मानव संसाधन विकास मंत्रालय भारत सरकार 'और ' भारतीय दार्शनिक अनुसंधान परिषद ' ने मिलकर किया था।
यह ग्रंथ साहित्य की उंन अपार क्षमताओं से परिचित करा है जिन्हें, पूरी तरह नज़र अंदाज़ कर दिया गया था।
मानविकी विषयों के अनुसंधान में, विशुद्ध विज्ञान (एप्लाइड साइंस ) के अंतर्गत् हिंदी भाषा साहित्य में ,यह शोध किया गया , यह पहला अनूठा और अछूता शोधकार्य है ,जिसने, विज्ञान और साहित्य को एक जमात में ला खड़ा किया है और,प्रयोगशाला बनाकर अपने प्रामाणिक निष्कर्ष दिए हैं ।
उन सबकी आभारी हूं जिनसे ,प्रत्यक्ष - अप्रत्यक्ष मुझे प्रेरणा मिली है ।
यह ग्रंथ हिंदी में शोध की नयी क्रांतिकारी दिशा और दशा का महत्वपूर्ण संकेत है।
अंत में..
कहना है यही कि ..मैं , जंगल की बेटी हूं.. और जंगल से ब्याही हूं..
जंगल की हरी मेंहदी मेरे हाथों में लगी है ..बार बार जंगल में लौटती हूं, मेरी रूहदारी में जंगल की गोद ही मेरा आख़िरी ठिकाना है .. आभारमना ..मीरा गौतम