व्यथा–कथा डूब की" पुस्तक हुई लोकार्पित* *आँसुओं की स्याही से लिखी गई है व्यथा–कथा डूब की– मनोज श्रीवास्तव
व्यथा–कथा डूब की' आँसुओं की स्याही से लिखी गई पुस्तक है। यह पुस्तक हरसूद कस्बे के साथ उन 254 गाँवों की डूब रही धरती के नाम करुणा से ओतप्रोत एक प्रेम पत्र भी है। यह पुस्तक हमें सीधे डूब प्रभावित लोगों से मिलवाती है। यह पुस्तक सिर्फ विस्थापितों का दर्द ही बयां नहीं करती, बल्कि विनाश की शर्त पर बनाए गए बड़े बाँधों के निर्माण को दृढ़तापूर्वक अस्वीकार भी करती है। इस संग्रह के लेखक अपने लेखकीय दायित्व को पूरी ईमानदारी के साथ रेखांकित करते हैं।'
उक्त विचार अक्षरा के प्रधान संपादक एवं राज्य निर्वाचन आयुक्त श्री मनोज श्रीवास्तव ने वरिष्ठ ललित निबंधकार डॉ. श्रीराम परिहार द्वारा रचित पुस्तक "व्यथा–कथा डूब की" के 'लोकार्पण समारोह को बतौर मुख्य अतिथि संबोधित करते हुए व्यक्त किए।
पुस्तक लोकार्पण समारोह एवं चर्चा का आयोजन आईसेक्ट पब्लिकेशन, वनमाली सृजन पीठ, स्कोप ग्लोबल स्किल्स विश्वविद्यालय के संयुक्त तत्वावधान में दुष्यंत कुमार स्मारक पांडुलिपि संग्रहालय, भोपाल में किया गया। सर्वप्रथम अतिथियों द्वारा दीप प्रज्वलित कर एवं सरस्वती जी की प्रतिमा पर माल्यार्पण कर समारोह का शुभारंभ किया गया।
डॉ. श्रीराम परिहार ने डूब की दर्द भरी दास्तान सुनाते हुए कहा कि नर्मदा बाँध निर्माण में डूबे कस्बे हरसूद पर बहुत कुछ लिखा गया, लेकिन उसके साथ डूबे 254 गाँवों पर किसी ने कुछ नहीं लिखा। इन गाँवों ने भी अपना सबकुछ खोया हैं। ये 254 गाँव हमेशा–हमेशा के लिए डूबो दिये गए। इनमें मेरा गाँव पिपरिया भी डूबा है। इस पुस्तक में इन्हीं गाँवों के अथाह दुःख को बहुत भारी मन से लिखा गया है।
डॉ. श्रीराम परिहार ने आगे कहा कि डूब की त्रासदी पर कई कविताएँ, कहानियाँ और उपन्यास लिखे गए, लेकिन यह संभवतः पहला शोधपरक निबंध संग्रह है। डूब के पहले आई दीवाली को याद करते हुए डॉ. श्रीराम परिहार ने भावविह्वल स्वर में कहा कि हम दीप प्रज्वलित कर रहे थे जीवन में उजास के लिए लेकिन यह उस गाँव की अंतिम दिवाली थी। किसी गाँव का डूब जाना उससे जुड़ी समस्त सांस्कृतिक विरासत का डूब जाना होता है। हमें विकास के लिए नये विकल्प खोजना ही होगें। बेशक हमें जल भी चाहिए, लेकिन इसके लिए छोटे–छोटे बाँध बनाए जा सकते हैं, ताकि जन हानि न हो, जन समुदाय को अपनी जड़ों से विस्थापित भी न होना पड़े। इस अवसर पर अपने स्वयं के गाँव पिपरिया को केंद्र में रखकर निबंध 'एक गाँव डूबता है' पढ़कर सुनाते हुए कई बार उनके आँसू छलक आए, जिससे सारा परिसर भी भावूक हो उठा।
उल्लेखनीय है कि डॉ. श्रीराम परिहार ने व्यथा–कथा डूब की (शोक–गद्य) में 'पत्ते टूटे डाल के', 'एक गाँव डूबता है तो', 'डूबकर भी स्मृतियों में अमिट गाँव', 'डूब में भीगी पलकें; पथराई आँखें', 'डूब की त्रासदी में डूबता हरसूद', 'डूबता हरसूद सिसकती संस्कृति', 'हरसूद : विनाश की डाली पर निर्माण का नीड़', 'डूबता आदमी; तैरता मुआवजा', 'एक स्टेशन की मौत', 'जब नर्मदा की धारा बन्द हुई', 'निर्गुण धाम सिंगाजी' कुल ग्यारह लेखों में हरसूद की 'व्यथा–कथा डूब की' के माध्यम से एक संस्कृति, सांस्कृतिक धरोहरों, आध्यात्मिक विरासत, सामाजिक, आर्थिक और मानवीय त्रासदी को बहुत मर्मस्पर्शी रूप में बयां किया है। यह पुस्तक आईसेक्ट पब्लिकेशन, भोपाल से प्रकाशित हुई है।
लोकार्पण समारोह को संबोधित करते हुए डॉ. रामवल्लभ आचार्य, वरिष्ठ गीतकार-साहित्यकार ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में कहा कि व्यथा–कथा डूब की एक भोगा हुआ यथार्थ है। इस पुस्तक के निबंध पाठकों के मन में गहरी करुणा जगाते हैं।
विशिष्ट अतिथि श्री मुकेश वर्मा, वरिष्ठ कथाकार एवं अध्यक्ष, वनमाली सृजन पीठ, भोपाल ने अपने उद्गार व्यक्त करते हुए कहा कि यह बहुत भावुक क्षण है कि हम एक रचनाकार के माध्यम से डूब की वेदना को महसूस कर पा रहे हैं। हमारे देश के विकास मॉडल पर हमें पुर्नविचार करने की जरूरत है। हमें प्रकृति भी चाहिए और प्रगति भी चाहिए। हमें विकास के संतुलित मॉडल ही अपनाने चाहिए।
श्री मुदित श्रीवास्तव, युवा कवि ने कहा कि जब लेखक की पीड़ा और शब्दों की पीड़ा एक साथ मिलती है तो 'शोक गद्य' लिखा जाता है। डॉ. श्रीराम परिहार ने बहुत संवेदनशीलता से डूब की व्यथा–कथा लिखी है। इस पुस्तक को पढ़ते हुए पाठक स्वयं को भावनाओं की गहराईयों में डूबने से नहीं रोक पाता है।
इस अवसर पर दुष्यंत संग्रहालय की सचिव करुणा राजुरकर जी को डॉ. श्रीराम परिहार जी ने 'व्यथा–कथा' पुस्तक की प्रतियाँ भेंट स्वरूप प्रदान की। कार्यक्रम का सफल संचालन श्री महीप निगम, वरिष्ठ प्रबंधक, आईसेक्ट पब्लिकेशन (मार्केटिंग) द्वारा किया गया। कार्यक्रम का संयोजन एवं स्वागत उद्बोधन सुश्री ज्योति रघुवंशी, प्रबंधक, आईसेक्ट पब्लिकेशन, राष्ट्रीय संयोजक, वनमाली सृजन पीठ द्वारा दिया गया।
कार्यक्रम के अंत में आभार श्री संजय सिंह राठौर, सचिव, विश्व रंग द्वारा दिया गया। उल्लेखनीय है कि इस अवसर पर बड़ी संख्या में साहित्यकारों और साहित्यप्रेमियों ने रचनात्मक उपस्थिति दर्ज कराई